Thursday, 15 March 2018

उत्तर प्रदेश लोकसभा उपचुनाव में फिर हारी भाजपा - विपक्ष को मिली नहीं ऊर्जा

उत्तरप्रदेश में लोकसभा की दो सीटों पर हुए उपचुनाव नतीजों को भाजपा हल्के में ले रही है तो विपक्ष को इस जीत से नई ऊर्जा मिली है




पहले गुजरात, फिर राजस्थान और मध्य प्रदेश, और अब उत्तर प्रदेश-बिहार में भाजपा को लगा झटका किसी बड़े राजनीतिक उलटफेर से कम नहीं माना जा सकता। चार महीने पहले गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा ढाई दशक में पहली बार सौ सीटों से नीचे खिसक गई। जनवरी के आखिर में राजस्थान की दो लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा की करारी पराजय। इसके बाद मध्य प्रदेश से उठी हवा अब उत्तर प्रदेश में भी दिखाई पड़ गई।


गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटें भाजपा लाखों मतों से जीती थी लेकिन उपचुनाव में उसे हार का सामना करना पड़ा। बिहार के संसदीय उपचुनाव में भी भाजपा को मुंह की खानी पड़ी। ये वही पांच राज्य है, जिन्होंने २०१४ के लोकसभा चुनाव में भाजपा को प्रचंड जीत दिलाई थी। इन राज्यों की २०० लोकसभा सीटों में से भाजपा ने १८२ पर कब्जा जमाया था। उत्तर प्रदेश की दोनों लोकसभा सीटों पर उपचुनाव में भाजपा की हार कई मायनों में चौंकाने वाली है।
गोरखपुर सीट पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का लम्बे समय से कब्जा था। फूलपुर सीट पर उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य पिछली बार भारी मतों से विजयी हुए थे। अपने प्रभाव वाले राज्यों में एक के बाद एक हार, भाजपा के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है। भाजपा विरोधी दलों के लिए इन नतीजों में एक संदेश छिपा है।

दोनों सीटों पर दो धुर विरोधी दलों का एक होकर चुनाव लडऩा बड़ा फैसला था। समाजवादी पार्टी के प्रत्याशियों को बसपा का समर्थन विपक्षी एकता की शुरुआत के रूप में देखा जा सकता है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भारी बहुमत से जीतने वाली योगी सरकार चार दिन बाद अपना एक साल का कार्यकाल पूरा करने जा रही है। दोनों सीटों के उपचुनाव को सरकार के कामकाज की कसौटी के रूप में भी देखा जा रहा था

इस लिहाज से माना जा सकता है कि राज्य की जनता सरकार के कामकाज से खुश नहीं है। भाजपा इन चुनाव नतीजों को उपचुनाव मानकर हल्के में ले रही है तो विपक्ष को इस जीत से नई ऊर्जा मिली है। उत्तर प्रदेश में मिली इस जीत को विपक्ष कितना भुना पाता है ये तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन नतीजों ने २०१९ के लोकसभा चुनाव के अत्यंत रोमांचक होने की नींव जरूर रख दी है\

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उत्तरप्रदेश उपचुनाव से निकला विपक्ष के लिए एकता का संदेश


पूर्वोत्तर राज्यों के चुनाव परिणामों ने भाजपा को जश्न मनाने के जो अवसर दिए थ वेे उत्तर प्रदेश और बिहार के तीन...
पूर्वोत्तर राज्यों के चुनाव परिणामों ने भाजपा को जश्न मनाने के जो अवसर दिए थ वेे उत्तर प्रदेश और बिहार के तीन लोकसभा उपचुनावों ने छीन लिए हैं। इन परिणामों को सीधे 2019 से जोड़ देना जल्दबाजी होगी लेकिन, इसने बिखर रहे विपक्ष को एकता की नई रोशनी जरूर दी है। बिहार की अररिया लोकसभा और जहानाबाद विधानसभा सीट पहले से राष्ट्रीय जनता दल की रही है इसलिए यहां पर राजद की जीत से लालू की मजबूती और तेजस्वी की लोकप्रियता से बड़ा कोई संदेश नहीं निकलता। बड़ा संदेश निकल रहा है उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव से जहां 2014 के चुनाव में राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य जीते थे और उनके इस्तीफे से यह सीटें खाली हुई थीं। ऐसे समय में जब भाजपा के दिग्विजय का डंका चारों ओर बज रहा है तब देश के सबसे बड़े राज्य की दो अहम सीटों पर भारी अंतर से पिछड़ जाना प्रदेश के प्रशासन पर बड़ी टिप्पणी है। यह टिप्पणी है उस अव्यवस्था पर है जो कुछ महीने पहले गोरखपुर के अस्पतालों में एनसेफेलाइटिस से बच्चों के मरने पर दिखी थी और सरकार के मंत्रियों के संवेदनहीन बयानों में प्रकट हुई थी। यह अभिव्यक्ति है किसानों और युवाओं की उस नाराजगी की जो कृषि की उपज के उचित दाम और नौकरियां न मिलने से पैदा हुई है। यह उत्तर प्रदेश भाजपा में चल रही खींचतान का परिणाम भी हो सकता है। उससे कहीं ज्यादा यह समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच बने तात्कालिक गठबंधन का असर है। स्पष्ट है कि सामाजिक न्याय की इन दोनों पार्टियों को महसूस हो गया है कि अगर वे राम लहर को रोकने वाले 1993 के मुलायम-कांशीराम गठबंधन को याद करेंगी तो भाजपा का मुकाबला कर सकती हैं और अगर वे 1995 के राज्य अतिथि गृह कांड को याद रखेंगी तो अस्तित्व भी गंवा सकती हैं। हालांकि मायावती ने इस गठबंधन को सिर्फ इन्हीं चुनावों तक बताया था लेकिन, इन चुनावों के अच्छे नतीजों से वे सबक ले सकती हैं और देश में विपक्षी एकता के प्रयासों को अमली जामा पहना सकती हैं। दूसरी ओर बिहार में अररिया और जहानाबाद की सीट कायम रखते हुए राजद ने आत्मविश्वास हासिल किया है और यह दिखाया है कि अगर लालू प्रसाद लंबे समय जेल में रहते हैं तो उनका मतदाता और आक्रामक व एकजुट होगा जो राजग के लिए भारी पड़ेगा। 

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