उत्तरप्रदेश में लोकसभा की दो सीटों पर हुए उपचुनाव नतीजों को भाजपा हल्के में ले रही है तो विपक्ष को इस जीत से नई ऊर्जा मिली है
पहले गुजरात, फिर राजस्थान और मध्य प्रदेश, और अब उत्तर प्रदेश-बिहार में भाजपा को लगा झटका किसी बड़े राजनीतिक उलटफेर से कम नहीं माना जा सकता। चार महीने पहले गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा ढाई दशक में पहली बार सौ सीटों से नीचे खिसक गई। जनवरी के आखिर में राजस्थान की दो लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में भाजपा की करारी पराजय। इसके बाद मध्य प्रदेश से उठी हवा अब उत्तर प्रदेश में भी दिखाई पड़ गई।
गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटें भाजपा लाखों मतों से जीती थी लेकिन उपचुनाव में उसे हार का सामना करना पड़ा। बिहार के संसदीय उपचुनाव में भी भाजपा को मुंह की खानी पड़ी। ये वही पांच राज्य है, जिन्होंने २०१४ के लोकसभा चुनाव में भाजपा को प्रचंड जीत दिलाई थी। इन राज्यों की २०० लोकसभा सीटों में से भाजपा ने १८२ पर कब्जा जमाया था। उत्तर प्रदेश की दोनों लोकसभा सीटों पर उपचुनाव में भाजपा की हार कई मायनों में चौंकाने वाली है।
गोरखपुर सीट पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का लम्बे समय से कब्जा था। फूलपुर सीट पर उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य पिछली बार भारी मतों से विजयी हुए थे। अपने प्रभाव वाले राज्यों में एक के बाद एक हार, भाजपा के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है। भाजपा विरोधी दलों के लिए इन नतीजों में एक संदेश छिपा है।
दोनों सीटों पर दो धुर विरोधी दलों का एक होकर चुनाव लडऩा बड़ा फैसला था। समाजवादी पार्टी के प्रत्याशियों को बसपा का समर्थन विपक्षी एकता की शुरुआत के रूप में देखा जा सकता है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भारी बहुमत से जीतने वाली योगी सरकार चार दिन बाद अपना एक साल का कार्यकाल पूरा करने जा रही है। दोनों सीटों के उपचुनाव को सरकार के कामकाज की कसौटी के रूप में भी देखा जा रहा था
इस लिहाज से माना जा सकता है कि राज्य की जनता सरकार के कामकाज से खुश नहीं है। भाजपा इन चुनाव नतीजों को उपचुनाव मानकर हल्के में ले रही है तो विपक्ष को इस जीत से नई ऊर्जा मिली है। उत्तर प्रदेश में मिली इस जीत को विपक्ष कितना भुना पाता है ये तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन नतीजों ने २०१९ के लोकसभा चुनाव के अत्यंत रोमांचक होने की नींव जरूर रख दी है\
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